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कांशीराम विरासत पर राजनीतिक संघर्ष
जयंती आयोजन को लेकर सपा और बसपा आमने-सामने आए
कांशीराम जयंती पर बढ़ी सियासी तकरार, सपा की पहल से बसपा प्रमुख मायावती नाराज
27 Feb 2026, 12:47 PM Uttar Pradesh - Lucknow
Reporter : Mahesh Sharma
Lucknow उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। समाजवादी पार्टी द्वारा प्रदेशभर में कांशीराम जयंती मनाने की घोषणा के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने नाराजगी जताई है। इस मुद्दे ने दलित राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है और दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।

समाजवादी पार्टी ने कांशीराम की जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का फैसला किया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि कांशीराम ने दलित और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी रणनीति के तहत सपा प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित कर दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसे आगामी चुनावों के मद्देनजर महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम माना जा रहा है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव पहले से ही पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए सामाजिक समीकरण साधने में जुटे हुए हैं। पार्टी दलित वर्ग के प्रभावशाली नेताओं को संगठन में जगह देकर अपने आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति बसपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

दूसरी ओर बसपा प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी की पहल पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कांशीराम की विचारधारा और संघर्ष को केवल बसपा ही सही मायने में आगे बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य दल केवल राजनीतिक लाभ के लिए कांशीराम के नाम का उपयोग कर रहे हैं।

बसपा नेताओं का कहना है कि कांशीराम ने जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उसका उद्देश्य दलित समाज को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान दिलाना था। ऐसे में किसी अन्य दल द्वारा उनकी जयंती मनाना राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित कदम माना जा रहा है। बसपा का मानना है कि इससे दलित वोटों के बिखरने की संभावना बढ़ सकती है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। इसी कारण विभिन्न दल इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। कांशीराम की विरासत को लेकर छिड़ी यह सियासी प्रतिस्पर्धा आने वाले चुनावों में और तेज हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कांशीराम की राजनीतिक विरासत पर दावा करने की यह लड़ाई दरअसल दलित वोटों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा का संकेत है। आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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