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सुप्रीम कोर्ट ने तेज फैसला
बंगाल SIR केस 80 लाख मामले जज अन्य राज्यों से सहयोग
सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया तेज, झारखंड-ओडिशा के जज भी बंगाल के केस निपटाएंगे
24 Feb 2026, 03:09 PM
West Bengal
-
Kolkata
Reporter :
Mahesh Sharma
Kolkata
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR (समयबद्ध इंस्टीट्यूशनल रिव्यू) प्रक्रिया को तेज करने के लिए बड़ा फैसला सुनाया है। सीजेआई डी.वाई. सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य के करीब 80 लाख लंबित मामलों के निपटान के लिए झारखंड और ओडिशा के जजों की मदद लेने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कलकत्ता हाईकोर्ट के पास फिलहाल 220 एडीजे (असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट जज) स्तर के न्यायाधीश उपलब्ध हैं। यदि एक न्यायाधीश प्रतिदिन 20 मामले निपटाए, तो भी लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए इसे पूरा करने में वर्षों लग सकते हैं।
सीजेआई ने कहा कि लंबित मामलों की संख्या और संसाधनों की कमी को देखते हुए पड़ोसी राज्यों के जजों को अस्थायी तौर पर बंगाल के मामलों में नियुक्त किया जा सकता है। इससे SIR प्रक्रिया में तेजी आएगी और मामलों का समाधान जल्द संभव होगा।
इस प्रस्ताव पर पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कल्याण बनर्जी ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यदि पड़ोसी राज्य के जज भेजे जाते हैं, तो भाषा और न्यायिक प्रथाओं में अंतर के कारण समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। सीजेआई ने इसे स्वीकार करते हुए कहा कि प्रशासनिक और भाषाई सहायता दी जाएगी ताकि निपटान प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए कि सभी पक्षों को सुनवाई के दौरान पूरी पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य की संप्रभुता या न्यायिक प्रक्रिया बाधित नहीं होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला लंबित मामलों के समाधान में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। बंगाल में SIR प्रक्रिया में तेजी लाने से केवल न्याय प्रणाली की गति बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों को लंबे समय तक मामलों में फंसे रहने से राहत भी मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह संकेत मिलता है कि भारत में न्यायिक प्रणाली के सुधार और समयबद्ध समाधान को प्राथमिकता दी जा रही है। बंगाल, झारखंड और ओडिशा के जजों के सहयोग से उम्मीद है कि 80 लाख लंबित मामलों का बोझ कम होगा और न्याय के लिए लंबी प्रतीक्षा समाप्त होगी।
राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फैसले से राज्य में न्यायिक व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा। अदालत की सख्त निगरानी और निर्देशों के तहत यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, जिससे लंबित मामलों का समयबद्ध निपटान सुनिश्चित हो सके।
बंगाल में न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के इस प्रयास को सभी पक्षों ने गंभीरता से लिया है। अब यह देखना होगा कि न्यायालय की इस रणनीति से लंबित मामलों के निपटान में कितनी वास्तविक तेजी आती है और नागरिकों को न्याय तक पहुँचने में कितनी राहत मिलती है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कलकत्ता हाईकोर्ट के पास फिलहाल 220 एडीजे (असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट जज) स्तर के न्यायाधीश उपलब्ध हैं। यदि एक न्यायाधीश प्रतिदिन 20 मामले निपटाए, तो भी लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए इसे पूरा करने में वर्षों लग सकते हैं।
सीजेआई ने कहा कि लंबित मामलों की संख्या और संसाधनों की कमी को देखते हुए पड़ोसी राज्यों के जजों को अस्थायी तौर पर बंगाल के मामलों में नियुक्त किया जा सकता है। इससे SIR प्रक्रिया में तेजी आएगी और मामलों का समाधान जल्द संभव होगा।
इस प्रस्ताव पर पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कल्याण बनर्जी ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यदि पड़ोसी राज्य के जज भेजे जाते हैं, तो भाषा और न्यायिक प्रथाओं में अंतर के कारण समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। सीजेआई ने इसे स्वीकार करते हुए कहा कि प्रशासनिक और भाषाई सहायता दी जाएगी ताकि निपटान प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए कि सभी पक्षों को सुनवाई के दौरान पूरी पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य की संप्रभुता या न्यायिक प्रक्रिया बाधित नहीं होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला लंबित मामलों के समाधान में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। बंगाल में SIR प्रक्रिया में तेजी लाने से केवल न्याय प्रणाली की गति बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों को लंबे समय तक मामलों में फंसे रहने से राहत भी मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह संकेत मिलता है कि भारत में न्यायिक प्रणाली के सुधार और समयबद्ध समाधान को प्राथमिकता दी जा रही है। बंगाल, झारखंड और ओडिशा के जजों के सहयोग से उम्मीद है कि 80 लाख लंबित मामलों का बोझ कम होगा और न्याय के लिए लंबी प्रतीक्षा समाप्त होगी।
राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फैसले से राज्य में न्यायिक व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा। अदालत की सख्त निगरानी और निर्देशों के तहत यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, जिससे लंबित मामलों का समयबद्ध निपटान सुनिश्चित हो सके।
बंगाल में न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के इस प्रयास को सभी पक्षों ने गंभीरता से लिया है। अब यह देखना होगा कि न्यायालय की इस रणनीति से लंबित मामलों के निपटान में कितनी वास्तविक तेजी आती है और नागरिकों को न्याय तक पहुँचने में कितनी राहत मिलती है।
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